हर आंख में दम तोड़ते कुछ अरमान दिखे,
मुझे तेरे शहर के सब चेहरे परेशान दिखे...
दूसरों की निगाहो में अपनी इज्जत देखने,
अपनी ही आँखों में गिरते लोग तमाम दिखे...
आसमाँ छूती इमारतें कामयाबी की इबारतें है
मुझे तो सिर्फ कब्रों पर तने कुछ मकान दिखे.....
जो करते थे दावा ज़माने का दर्द दूर करने का,
वो दवा के नाम पे बेचते मौत का सामान दिखे......
रिश्तो के खून की स्याही से छपे किस्सों पर
चौक पर दिल्लगी करते लोग सरेआम दिखे....
ज़िंदगी की बेहतरी के लिए घिसती जिंदा मशीनें
और बाज़ार में इंसानियत बेचते कुछ इंसान दिखे...
No comments:
Post a Comment