Sunday, 10 July 2022

यूं तो मेरी क‍िताबों से कोई गहरी दोस्ती नहीं
पर अक्सर घर में उनका जमघट लगा लेता हूं...

फ‍िर पूछती है खुद मेरी बेरुखी ही मुझसे
उन्हें अलमारी में सजा देता हूं या सजा देता हूं...

मयकशी मेरी फ‍ितरत में है न मेरे खून में है
ये न मेरे शौक में है न जुनून में है...

न रूह से न सूकून से बावस्ता है 
न ये मेरे वक्त काटने का रस्ता है...

न गम हल्के होते हैं न खुशियां बढ़ती हैं 
न सहूल‍ियतें होती है न मुश्क‍िलें कटती हैं...

हां मेरा हमप्याला अपना सा लगने लगता है
इससे रोना और हंसना आसां सा लगेन लगता है...

Monday, 30 November 2015


मैंने यह बात अब समझी है
तूने मेरी बात कब समझी है...

जबसे रोशन हुए तेरी यादों से
रात को रात कब समझी है...

हाल पानी पर लिखके मिटाते हैं
वो मेरे जज़्बात कब समझी है...

जहन में तू तो दुनिया क्या समझें
कलंदर ने शाह की औकात कब समझी है


Monday, 16 November 2015

जिस नशे के नाम फ़ना है जिंदगियां
उसी नशे से फिर मुखातिब हूँ मैं

कितनी जीती बाज़ी हार चुका इस जिद पे
उसी जिद पर अब भी काबिज़ हूँ मैं

होश में लगती है बोझिल सी जिंदगी
के चलो इस बोझ से तो फारिग हूँ मैं
जाते-जाते उनके ख़्वाब का ये भी एक असर गया
वो बस एक खयाल था, काग़ज़ पर उतर गया

उस पर शक़ से खुद पर यकीन ज़्यादा था मुझे 
क़त्ल होने जब भी गया साथ खंज़र रखकर गया

जिस घर को बनाने क़र्ज़ अपने सर लिया था
उस क़र्ज़ को चुकाने उसी घर से यायावर गया 
बेवजह दिलपर न कोई बोझ भारी रखिए
ज़िंदगी ज़ंग है, बस ज़ंग ज़ारी रखिए

इश्क की राहों पर आएंगे कई गुलशन यूँ तो
आप फूलों संग काँटों से भी यारी रखिए

सुराखों से झांकने वाले झांककर ही मानेगें
क्या चिलमन गिराएँ क्या पर्दादारी रखिए

जितना अज़ीज़ उतना गालियों से नवाज़ा
   दोस्ती में कुछ अदब कुछ रवादारी रखिए  


तुम नादानियाँ करो हम उसपे पर्दा करें
मैं तुम्हें माफ़ करूँ और मुझे ख़ुदा करे

आँखों के रस्ते दिल में उतरूं कैसे भला
जब मेरा महबूब ही मुझसे पर्दा करे

उसे गुमान हुस्न पर नहीं शक़ मेरी नीयत पे है
वो तो हिज़ाब के बहाने मेरी आँखों पे पर्दा करे

मक़बूल होने का एक रास्ता ये भी था
वो परदे की चीज़ें भी पर्दे पे बेपर्दा करे

क्या इतना मुश्किल था कवाईद मज़हब का
जो वो एक नुक्ते से ख़ुदा को जुदा करे 
दानिस्ता होके भी वो बावस्ता नहीं
दिल के आईने में कोई चेहरा नहीं

हर पल खुश्बूओ-सा महका करे है
वो जो मुझमें तो है पर मेरा नहीं

मेरी ख़ामोशी से है शिकायत मेरी
उसने वो सुना जो मैंने कहा नहीं

अजब-सी है दिल की अदालत भी
मुद्दई तो है लेकिन कोई मुद्दा नहीं

दनिश्ता= जानते हुए 

Saturday, 4 April 2015

ये दिल का मामला इतनी आसानी से सुलझता नहीं दिखता 
मैंने जिसे दिल दिया वही दिल का मरीज़ निकला ...
Equation of DELHI -------
‪#‎Aap‬ = ‪#‎Yogendra‬ + ‪#‎Prashant‬ / problems with ‪#‎Kejriwal‬: 
More characters= More conflicts= More Entertainment
न प्रतिवेदन, न विषाद, न कोई अनुशंसा
   श्रेष्ठ कार्य की मात्र मुक्त कंठ से प्रशंसा …


साधुवाद, धन्यवाद , आभारों से अभिनंदन
    सफलता करती स्वयं वीरों का आलिंगन …


विशुद्ध खेल अथवा यह व्यवसायिक मनोरंजन
     स्वेद- सा प्रवाहित रक्त कण, आवेशित स्पंदन …


है यदि यह विशुद्ध खेल तो स्वीकारें खेल भावना से
    व्यवसयिक मनोरंजन तो मनोरंजन की कामना से …


आरम्भ का अंत न अंत का अंततोगत्वा
     फिर सजेगी रणभूमि फिर चढ़ेगी प्रत्यंचा …


न प्रतिवेदन, न विषाद, न कोई अनुशंसा
      श्रेष्ठ कार्य की मात्र मुक्त कंठ से प्रशंसा …।।



Good effort Team India, All the BEST for #2019 WC.... Mauka- Mauka....

Wednesday, 11 June 2014

लोग फिक्रमंद है मेरी सेहत को लेकर पर
हिदायतों पर मुझसे ही अमल नहीं होता
बज़ा फ़रमाते है गलतियाँ करने वाले
मुझसे ही कोई काम सही नहीं होता ..........

के चलो इस साल ये भी आज़मा के देखते है....

के चलो इस साल ये भी आज़माकर  देखते हैं
ये साल तो कसम खाए बिना गुज़ारकर देखते हैं ......

न दोस्ती का नशा टूटा है न मोहब्बत का
इस फेहरिश्त में कोई नया नाम जोड़कर  देखते हैं....

नशे से तौबा की कसम रही है अव्वल कसम
उसी नशे से साल का आगाज़कर देखते हैं....

पिछले कई सालो में कितनी कसमों  ने दम तोड़ा
कसमों  की कब्रों का हिसाब निकालकर देखते हैं...

कसमों  की ज़िदगी अक्सर बहुत कम रही हैं
खुद को वो तारीख याद दिलाकर देखते हैं ...

कसम भी अब रहम की भीख माँगा करती हैं
ये साल तो कसम खाए बिना गुज़ारकर देखते है......
जश्न-ए-कारवां में हर शय यूँ जुड़ गई
के हवा के रुख संग राहें भी मुड़ गई

आलम-ए-बेफिक्री में ऐसे सोए  हम
जब ऑंखें खुली तो नींद ही उड़ गई

चले थे दर्द-ए-दिल का इलाज कराने
ज्यों-ज्यों दवा हुई हालत बिगड़ गई

कल एक मोड़ पर मिली थी ज़िंदगी
आँख क्या मिलाई पीछे ही पड़ गई
हर आंख में दम तोड़ते कुछ अरमान दिखे,
मुझे तेरे शहर के सब चेहरे परेशान दिखे...

दूसरों  की निगाहो में अपनी इज्जत देखने,
अपनी ही आँखों में गिरते लोग तमाम दिखे...

आसमाँ छूती इमारतें  कामयाबी की इबारतें है
मुझे तो सिर्फ कब्रों पर तने कुछ मकान दिखे.....

जो करते थे दावा ज़माने का दर्द दूर करने का,
वो दवा के नाम पे बेचते मौत का सामान दिखे......

रिश्तो के खून की स्याही से छपे किस्सों पर
चौक पर दिल्लगी करते लोग सरेआम दिखे....

ज़िंदगी की बेहतरी के लिए घिसती जिंदा मशीनें
और बाज़ार में इंसानियत बेचते कुछ इंसान दिखे...
उसने हमें हर मुलाक़ात में नज़रअंदाज़ किया
लेकिन ये उनकी अदा नहीं एक  इशारा था.......

Tuesday, 10 June 2014

इस बेसब्री में  कहीं न कहीं तू है, ये इंतज़ार बेवजह नहीं
रात लंबी है मेरे नसीब में या इस रात की सुबह नहीं.........
इस इश्क में तेरे हुस्न की कोई खता  थी
शायद इतेफ़ाक से मैं  ही दीवाना हो गया......
बड़ा खूबसूरत एहसास है तेरा एहसास करना
बहुत महसूस होता है मुझे तेरा महसूस करना......

Monday, 9 June 2014

के हरेक शख्स ने अपन शख्सियत पे एक लबादा ओढ़ रखा है
मज़मून कुछ और है किताब का, ज़िल्द  पे नाम कुछ और लिखा है ........
औरो के बागबां देख दिल रश्क से पूछता है
मेरे आंगन का शज़र जाने कब हरा होगा………

ज़िन्दगी सबको देती रही है हर मौका दुबारा
दूजा मौका क्या इस मौके जैसा सुनहरा होगा………

वक्त का मरहम भर देता है हर ज़ख्म को
अगला ज़ख्म मिलने से पहले ये भरा होगा……

हिसाब-किताब में हाथ ज़रा तंग तो था
सोचा न था मेरा हिसाब इस तरह होगा……
गर मुझे जानने की हसरत है
एक शाम मेरा हमप्याला बन
देखना तुझे तुझसे मिलवायेंगे .........


वो आये सिर्फ जब ख़ुशी की इंतेहा न थी
वो आये सिर्फ जब गम की थाह न थी
ऐ अश्को मेरे दोस्तों की नक़ल न करो......


यूँ तो मुझे खबरों में रहने का हुनर नहीं आता पर दिलो में मेरी शोहरत देख ले तो उन्हें भी रश्क होगा.....
उस आदमी का कद पहचान सका न को जो आदमी झुककर चलता है........
अपनेपन के नाम पर लोगो को परेशां करता हूँ
वरना किसी की मशरूफियत में खलल मेरी फितरत नहीं
अजाँ कहती फज़र की नमाज़ का वक़्त हो चला
मैं कहता ख्वाबगाह से बाहर आने की मेरी हिम्मत नहीं ......
बड़ी कडवाहटे है अंदर इसलिए ऐसा नहीं होता,
मैं हर रंग बदलता हूँ पर जायका नहीं होता ......

शिकायतो के बोझ से बोझिल हो चुकी जिंदगी,
चेहरा गंदा हो तो आईना साफ़ करो फायदा नहीं होता......

क्यों कुछ खतो की लाशें अपने पतों को पूछती है,
क्या लिखने वाले ने उसे दिल से नहीं लिखा होता........

अच्छा है मुझ होश में रहने की आदत नहीं है,
मैं होश की दवा करता तो कोई मयखाना नहीं होता....

बात दिल से निकले तो दिल तलक जाती है,
पर हर बात को समझना इतना आंसां नहीं होता.........

Saturday, 7 June 2014

कलम का कबूलनामा

के मोहलत ख़त्म हुई अब तकादे का वक़्त हो चला है,
अब मुझे इज़ाज़त दो मेरे जनाज़े का वक़्त हो चला है......

Wednesday, 4 June 2014

अतिशीयोक्ति  हिंदी भाषा के अलंकारो में से एक है,  जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को वर्णित करने के लिए उसे बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाए तो इसे ही  अतिशीयोक्ति कहा जाता है .....