Rahul.atisheeyokti
Monday, 16 November 2015
जिस नशे के नाम फ़ना है जिंदगियां
उसी नशे से फिर मुखातिब हूँ मैं
कितनी जीती बाज़ी हार चुका इस जिद पे
उसी जिद पर अब भी काबिज़ हूँ मैं
होश में लगती है बोझिल सी जिंदगी
के चलो इस बोझ से तो फारिग हूँ मैं
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