औरो के बागबां देख दिल रश्क
से पूछता है
मेरे आंगन का शज़र जाने कब हरा
होगा………
ज़िन्दगी सबको देती रही है हर
मौका दुबारा
दूजा मौका क्या इस मौके जैसा
सुनहरा होगा………
वक्त का मरहम भर देता है हर ज़ख्म
को
अगला ज़ख्म मिलने से पहले ये
भरा होगा……
हिसाब-किताब में हाथ ज़रा तंग
तो था
सोचा न था मेरा हिसाब इस तरह
होगा……
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