दानिस्ता होके भी वो बावस्ता नहीं
दिल के आईने में कोई चेहरा नहीं
हर पल खुश्बूओ-सा महका करे
है
वो जो मुझमें तो है पर मेरा नहीं
मेरी ख़ामोशी से है शिकायत मेरी
उसने वो सुना जो मैंने कहा नहीं
अजब-सी है दिल की अदालत भी
मुद्दई तो है लेकिन कोई मुद्दा नहीं
दनिश्ता= जानते हुए
दनिश्ता= जानते हुए
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